झारखंड के साहिबगंज जिले के कटघर गांव में धरती के नीचे से निकलने वाले पत्थर के चावल-दाल के दाने लोगों के लिए कौतूहल का विषय बन हुए हैं.

गांव में कहीं की जमीन खोदिए, आपको पत्थर के अनाज मिलने लगेंगे. लोगों के लिए यह किस्से कहानियों की बातें हैं, तो भूगर्भ वैज्ञानिको के लिए शोध का विषय.

इस बीच जाने-अनजाने में यह गांव पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन गया है. यहां न केवल झारखंड बल्कि पश्चिम बंगाल, ओड़िशा, छत्तीसगढ़ व बिहार जैसे पड़ोसी राज्यों से भी पर्यटकों का आना साल भर लगा रहता है.

कमाई का जरिया

पत्थर के अनाज की खुदाई में लगे मजदूर

पत्थर के अनाज की खुदाई में लगे मजदूर

गांव में घुसते ही गाड़ी के पीछे छोटे-छोटे बच्चो की टोलियां दौड़ने लगती हैं. सबकी हाथों में पत्थर के चावल-दाल-मटर-गेहूं जैसे दाने हैं.

वे इसे 5-10 रुपये की मामूली कीमत पर बेचते हैं. बताते हैं कि यह धरती के नीचे से निकला है.

बिहार की सरहद पर बसे साहिबगंज जिले के राजमहल अनुमंडल मुख्यालय से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर है कटघर गांव. पहले यहां कोई नहीं आता था लेकिन अब यहां लोगों की आवाजाही लगी रहती है.

क्या है प्रचलित किस्सा?

यहां हमारी मुलाकात हुई बलराम महतो से. वे इसी गांव के रहने वाले हैं. बलराम ने बताया कि वे अपने बचपन से ऐसा देखते आ रहे हैं.

उनके पूर्वजों ने भी अपने बचपन में मिट्टी की खुदाई कर ऐसे दाने निकाले हैं. बकौल बलराम, गांव में यह किस्सा प्रचलित है कि प्राचीन काल में यहां कोई साधु आया था.

उसने राजा से खाना मांगा लेकिन मन मुताबिक भोजन नहीं मिलने से वह क्रोधित हो गया. उसके श्राप के कारण सारे अन्न के दाने पत्थर में बदल गए.

बाद में राजा के माफी मांगने पर साधु का दिल पसीजा और उसने पत्थर बने अन्न को जमींदोज कर दिया. तब से आज तक जमीन की खुदाई करने पर ऐसे दाने निकलते हैं.

शोध का विषय

साहिबगंज कॉलेज में भूगर्भ विज्ञान के प्राध्यापक डा रंजीत कुमार सिंह कहते है कि धरती के नीचे से निकल रहे पत्थर के अन्न दरअसल शोध का विषय हैं.

उन्होंने बताया कि जियोलाजिकल सर्वे आफ इंडिया के वैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन करने की कोशिश की था लेकिन वे तब किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे.

तब माना गया कि शायद ये दाने सिलिका के कण हैं, जो राजमहल की पहाड़ियों मे दबे रह गए.

गौरतलब है कि राजमहल की पहाड़ियां अरबों साल पहले हुए ज्वालामुखी विस्फोट के कारण बनी थीं. इनका पीरियड हिमालय से भी पुराना है.

जुरासिक काल के जीवाश्म?

इस इलाके में जुरासिक काल के जीवाश्म भी मिले हैं. कभी स्वयं बीरबल साहनी ने यहां आकर जीवाश्मों की पहचान की थी.

आज भी लखनऊ स्थित बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट में इन जीवाश्मों पर शोध किया जा रहा है. डा रंजीत कुमार सिंह ने कहा कि संभव है कि इन पत्थर के दानों का संबंध भी जुरासिक काल से हो.

पर्यटन केंद्र बनाने की पहल

पत्थर के अनाज देखने आने वाले लोगों का नाम इस रजिस्टर में लिखा जाता है

पत्थर के अनाज देखने आने वाले लोगों का नाम इस रजिस्टर में लिखा जाता है

कटघर स्थित शिव मंदिर के पुजारी ने बताया कि उन्होंने मंदिर मे एक विजिटर रजिस्टर रखा है.

इसमें यहां आने वाले पर्यटक अपने अनुभव लिखते हैं. लोगों ने इस गांव को पर्यटन स्थल के तौर पर विकसित करने की मांग की है.

रहस्य बरकरार

बहरहाल, धरती के नीचे से निकलने वाले पत्थर के अन्न के दानों का रहस्य अभी बरकरार है. यह जानना बाकी है कि आखिर इसका क्या राज है.

स्थानीय पत्रकार हीरालाल राय कहते हैं कि सरकार को इसकी जांच करा कर स्पष्ट करना चाहिए कि आखिर धरती के नीचे से ऐसे दाने कैसे निकल रहे हैं.