गांधी की हत्या के पीछे एक वजह नाथूराम की ऐसी जिंदगी भी थी

1934 में बनी 9 एमएम की ऑटोमैटिक बरेटा पिस्टल आधी दुनिया का रास्ता तय करके 30 जनवरी, 1948 को बिड़ला हाउस पहुंचती है. एक ब्रिटिश आर्मी के भारतीय लेफ्टिनेंट कर्नल वीवी जोशी के हाथों.

मुसोलिनी की सेना के एक अफसर के आत्मसमर्पण करने के बाद ये उससे छीनकर लाई गई थी. बाद में जोशी मिलिट्री ऑफिसर ग्वालियर के महाराजा जयाजीराव सिंधिया की मिलिट्री में ऑफिसर हो गए.

वहां से ये पिस्तौल जगदीश प्रसाद गोयल के पास कैसे पहुंची? ये रहस्य है. पर गोयल इसे अब दंडवते को बेचा, जिसने नाथूराम गोडसे के लिए इसे खरीदा. दंडवते ने भरी हुई पिस्तौल और साथ में सात कारतूस 28 जनवरी की शाम नाथूराम गोडसे को एक होम्योपैथी के डॉक्टर परचुरे के घर पर सौंपे.

30 जनवरी, 1948 को, 5 बजकर 17 मिनट पर ये बरेटा पिस्तौल आखिरी बार फायर की गई. उसकी 9 एमएम की गोलियां करीब ढाई फीट की दूरी से महात्मा गांधी पर चलाई गईं. और इस तरह से आधुनिक युग के सबसे जघन्य अपराधों में से एक घटित हुआ और भारत के राष्ट्रपिता की हत्या कर दी गई.

हिटलर के आर्मीमैन की पिस्टल से महात्मा की हत्या हुई. राष्ट्रपिता की इतनी आसानी से हत्या हो गई. जिसकी सुरक्षा तत्कालीन सरकार के लिए राष्ट्रीय दायित्व का विषय होना चाहिए थी. बहरहाल, मुकदमा खत्म होने के बाद पिस्तौल दिल्ली में राजघाट के सामने बने राष्ट्रीय गांधी म्यूजियम में रख दी गई.

इस तरह से 14 साल से हिंदू महासभा गांधी की हत्या की जो साजिश रच रही थी, उसमें उसे सफलता मिल गई. बताते चलें कि इसके पहले किए गए कई प्रयासों में भी महासभा के दो कट्टर गोडसे और आप्टे शामिल थे. नाथूराम जिसने गांधी पर गोली चलाई, उसकी मानसिकता क्या रही होगी इसके लिए जरूरी है कि उसके बारे में जाना जाए.

नथ वाला राम बना नाथूराम

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गोडसे एक मध्यमवर्गीय चितपावन ब्राह्मण परिवार में पैदा हुआ था. चितपावन का शब्दश: मतलब होता है, ‘आग में पवित्र किए गए.’ चितपावनों के लिए अक्सर दो थ्योरी दी जाती हैं. एक कि यही आर्यों की पक्की विरासत को संभाल रहे हैं. दूसरी, ये मिस्र के यहूदियों की एक जाति हैं जो आगे चलकर ब्राह्मण हो गए.

वैसे जानने लायक बात ये भी है कि भारत के कुछ फेमस चितपावन ब्राह्मण समुदाय के लोगों में गांधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले और कांग्रेस के गरम दल के नेता लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक भी शामिल हैं.

खैर, नाथूराम गोडसे के पिता विनायक गोडसे भारतीय डाक सेवा में एक छोटे पद पर थे. गोखले के पिता ने 1892 में दस साल की चितपावन ब्राह्मण समुदाय की लड़की से शादी की थी. इन दोनों की पहली तीन संतानें बचपन में ही चल बसीं. उनमें से सिर्फ इनकी दूसरी संतान जो कि एक लड़की थी, वही जीवित बची.

इस घटना के बाद विनायक गोडसे के परिवार ने एक ज्योतिषी से सलाह ली. ज्योतिषी ने बताया कि ये घटनाएं एक ‘शाप’ के प्रभाव से हो रही हैं. इस ‘शाप’ का प्रभाव खत्म करने का सिर्फ एक ही तरीका है, ‘आप अपनी अगली संतान का पालन-पोषण लड़की की तरह करें.’

नाथूराम के मां-बाप ने इसके लिए सारे धार्मिक अनुष्ठान किए. उन्होंने मनौती मानी कि जन्म के बाद वो लड़के के बाएं नथुने को छिदवाएंगे और उसमें नथ भी पहनाएंगे. एक लड़का इसके बाद 19 मई, 1910 को पैदा हुआ. जैसे ही बच्चा पैदा हुआ, मनौती के अनुसार उसकी नाक छिदवाकर नाक में नथ पहना दी गई.

इस तरह से इस नथ पहनने वाले लड़के का नाम नाथूराम पड़ा. आगे जब बच्चे जिंदा रहने लगे तो नथ तो निकाल दी गई पर नाम नाथूराम ही रहा. नाथूराम के तीन भाई और दो बहनें थीं.

नाथूराम मैट्रिक भी नहीं पास कर सका

नाथूराम को लड़कियों की तरह पाले जाने के लिए बचपन भर चिढ़ाया गया. नाथूराम इससे काफी अकेले रहने लगा. कुछ लोग उसे मूर्ख समझने लगे और कुछ दैवीय शक्ति वाला. कुछ दिनों में उसके ऊपर कुल देवता भी आने लगे जो उसके किए प्रश्नों का उत्तर दिया करते थे. 16 साल तक ये चीजें चलीं, फिर अपने-आप ही रुक गईं.

नाथूराम गांव के स्कूल से मराठी पढ़ी. नाथूराम के लिए सबसे बड़ी समस्या थी अंग्रेजी. जिसके चलते वो मैट्रिक भी नहीं पास कर सका. ऐसे में एक अच्छी नौकरी खोज पाने में वो असफल हो रहा था, ज्यादा से ज्यादा उसे बढ़ईगिरी का काम मिल पाता था. ऐसे में वो रत्नागिरी चला आया. जहां पर सावरकर भी थे. अंग्रेजों से माफी मांगकर छूटे थे.

नाथूराम को उनका साथ मिला. विचारों से नाथूराम प्रभावित हुआ. और इसके बाद उसने तय किया कि हर तरह से असफल होने का इलाज यही मिशन पूरा करना है. नाथूराम ने इस तरह से पॉलिटिकल कट्टरता के युग में प्रवेश किया.

नाथूराम ने यूं पाई हिंसा की ट्रेनिंग

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हैदराबाद के हिंदुओं के अधिकारों के समर्थन में निकाली गई एक रैली में नाथूराम शामिल था. वहां उसे गिरफ्तार कर लिया गया. 1 साल नाथूराम जेल में रहा. जेल से छूटने के बाद नाथूराम गोडसे पूना लौटा. तब तक हिंदू महासभा में उसकी सक्रियता बढ़ चुकी थी. अब सावरकर एक राष्ट्रीय पार्टी बनाने की कोशिश कर रहे थे. ये पार्टी वो केवल मराठी ब्राह्मण समुदाय को शामिल कर बनाना चाहते थे.

इन्हीं सबके बीच नाथूराम गोडसे एक ऐसे आदमी से 1940 में मिला, जिससे उसकी दोस्ती जिंदगी भर चलने वाली थी. नारायण डी. आप्टे भी हाल में ही अहमदनगर से लौटा हुआ था. जहां वो हिंदू महासभा के लिए काम कर रहा था. दोनों के बीच बहुत सी बातें अलग थीं पर दोनों ने जिंदगी रहते एक-दूसरे का साथ निभाया.

1942 में कांग्रेस के सारे बड़े लीडर्स गिरफ्तार कर लिए गए. ऐसे में नई पार्टी की लॉन्चिंग के लिए सही समय देखा और पार्टी लॉन्च कर दी. गोडसे और आप्टे ने ये पार्टी ज्वाइन कर ली. इस दल को छोटी पर आक्रमक हिंदू महासभा समझ लीजिए. जब ये दल सबसे ज्यादा पॉपुलर हुआ तब इसमें 150 लोग थे. लगभग सारे पूना वाले ही इसमें शामिल थे.

दल की विशेषताओं पर नजर डालिए-

1. दल के सदस्यों को मार्शल आर्ट्स की ट्रेनिंग दी जाती थी.
2. सावरकर की फिलॉसफी की उन्हें शिक्षा दी जाती थी.
3. असहिष्णुता और कट्टरता की बाकायदा शिक्षा दी जाती थी.

पर इनके कुछेक काम जो जमीनी स्तर पर देखे जा सकता थे, वो थे-

1. कांग्रेस के नेताओं की मीटिंग में उपद्रव करते थे.
2. कांग्रेसी नेताओं को निशाना बनाते थे.
3. गांधी की हत्या की साजिश करते थे.

नाथूराम और आप्टे इस काम में सबसे आगे थे. नाथूराम और आप्टे ने एक अखबार निकालना शुरू किया, जिसपर रोज बैन लगते थे

1944 में नाथूराम ने आप्टे को हिंदू महासभा और हिंदू राष्ट्र दल की विचारधारा को बढ़ावा देने के लिए एक न्यूजपेपर शुरू करने का आइडिया दिया. एक साल बाद महाराष्ट्र में गुड़ीपड़वा त्योहार के दिन ‘अग्रणी’ नाम के अखबार का पहला अंक निकला.

पहले ही पन्ने पर सावरकर की तस्वीर छापी गई थी. ये काम आगे आने वाले सारे ही अंको में जारी रहा. नाथूराम इस अखबार का एडिटर था. और आप्टे था पब्लिशर. अखबार की शुरुआत सावरकर के आशीर्वाद के साथ ही हुई थी. जिन्होंने अपने इन दोनों मित्रों को अखबार की शुरुआत करने के लिए 15 हजार रुपये भी दिए थे.

ये साफ है कि आप्टे, नाथूराम से ज्यादा चालाक था. शायद इसीलिए नाथूराम ने आप्टे की लीडरशिप को स्वीकार लिया था. अखबार की हालत खराब थी पर इसे लगातार गिफ्ट के रूप में कट्टर लोगों से पैसे मिल रहे थे. अग्रणी के लेख बहुत ही कट्टर थे. ऐसे में कई बार बॉम्बे प्रोवेंशियल गवर्नमेंट के प्रेस एक्ट के उल्लंघन में अग्रणी के ऊपर कई अभियोग भी लग चुके थे.

नाथूराम ने इसके लिए भी कांग्रेस और उसके नेताओं को ही जिम्मेदार ठहराया था. इसी बीच सरकार ने जैसे ही अखबार को बंद करने का आदेश दिया, तुरंत पहले नाथूराम ने उसका नाम बदलकर ‘हिंदू राष्ट्र’ कर दिया.

‘चलो, गांधी को मारते हैं’

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इस दौरान उसने कॉफी पीने की लत लगा ली थी. नाथूराम अभी भी परिवार के शादी के लिए लाए जा रहे सारे रिश्ते को नकारता जा रहा था. नाथूराम गोडसे हमेशा ही आदमियों के इर्द-गिर्द रहता था. दरअसल नाथूराम को सभी संत जैसा मानते थे इसलिए भी ये कट्टर और सनकी औरतों से नफरत करने लगा था.

इसी दौर में अखबार के इंवेस्टर्स को कोई खास लाभ दिखना बंद हो गया. वो पैसे नहीं देना चाहते थे. आप्टे पैसे लाया करता था. नाथूराम और आप्टे का रोजगार खतरे में था. फिर से कुछ और रोजी-रोटी का जुगाड़ करना पड़ता. दोनों के बीच यही सारी बातें एक दिन कॉफी टेबल पर हो रही थीं कि आप्टे ने नाथूराम को अपना पुराना लक्ष्य फिर से याद दिलाया- ‘चलो, गांधी को मारते हैं.’

इसके आगे जो भी है, भारत के स्वतंत्रता के बाद के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक है. गांधी की हत्या की घटना पर किताब लिखने वाले उनके परपोते तुषार गांधी किताब के चैप्टर ‘हत्यारे’ की शुरुआत में हत्यारों का परिचय देते हुए लिखते हैं –

सभी लोग जो गांधी की हत्या में शामिल थे, स्वभाव में बहुत अलग-अलग थे. पर उन सबके अंदर एक बात बिल्कुल एक जैसी थी. सारे ही धर्मांध थे. एक औरतों से नफरत करने वाला रोगी (नाथूराम गोडसे), एक जिंदादिल पर व्याभिचारी (नारायण दत्तात्रेय आप्टे), एक अनाथ फुटपाथ पर रहने वाला बदमाश लड़का जिसने कट्टर बनकर खुद को बड़ा आदमी बनाना चाहा, एक धूर्त हथियारों का व्यापारी (दंडवते) और उसका नौकर, एक बेघर शरणार्थी जो बदला लेना चाहता था (मदनलाल पाहवा), एक भाई जो अपने भाई की हीरो की तरह मानकर पूजता था (गोपाल गोडसे) और एक डॉक्टर जिसका बचाने से ज्यादा मारने में विश्वास था (डॉ. दत्तात्रेय सदाशिव परचुरे). इनकी हथियार थी एक बंदूक. जो कि गांधी के हत्यारे के हाथ में पहुंचने से पहले तीन महाद्वीपों में घूम चुकी थी.

(सोर्सेज- तुषार गांधी, लेट्स किल गांधी; तपन घोष, गांधी मर्डर ट्रायल; जगन फडणीस, महात्म्याची अखेर; मनोहर मुलगांवकर पेपर्स, पीएल ईनामदार पेपर्स, जस्टिस खोसला पेपर्स)